Wednesday, December 14, 2022

SARAL ( AADHYAATMIK )

 

 

               सरल 


स्वभाव सबका अलग -अलग ,

किसी का है कठिन ,तो किसी का सरल ,

कोई  कठोर है दिल का ,

तो दूसरा है बहता हुआ तरल | 


तरल को रास्ता मिले तो ,

उधर ही बहता जाएगा ,

रास्ते में मिलने वालों को ,

अपने साथ में लेता जाएगा | 


जो कठोर है दिल का ,

वह तो दूजों का दिल दुखाएगा ,

मगर जो है सरल वह तो ,

दूजों के हिस्से का भी पी जाएगा गरल | 


जो पिएगा गरल वह तो ,

फिर भी जीवंत होगा ,

पी के गरल वह तो ,

शिव का अवतार कहलाएगा |  


Sunday, December 11, 2022

SANSAAR ( JIVAN )

   

 

                           संसार 


दोस्तों से भरा संसार है ,

उनमें से कुछ हमने चुने ,कुछ तुमने चुने ,

दोस्ती की राह में ,

कुछ हम भी बढ़े ,कुछ तुम भी बढ़े | 


रिश्तों से भरा संसार है ,

उनमें से ना हमने चुने ,ना तुमने चुने ,

ईश्वर के बनाए रिश्तों में ,

कुछ हमने निभाए ,कुछ तुमने निभाए | 


हरा -भरा ये संसार है ,

जो सारा का सारा ही ,ईश्वर ने बनाया ,

ईश्वर की बनाई हरियाली को ,

किसी ने उसे संवारा ,किसी ने उसे बिगाड़ा | 


ईश्वर की बनाई धरा पर ,

अनेक सरहदें खींची गईं ,बँटवारे किए गए ,

सँवारने वालों ने सुंदर किया धरा को ,

बिगाड़ने वालों ने ,प्रलय को बुलाया | 


Saturday, December 10, 2022

CHAURAHA JINDGI KA ( JIVAN )

 

                चौराहा जिंदगी का 


शहरों में जो सड़कें बनती हैं ,

उनमें कई मोड़ ही मुड़ते हैं ,

कई मोड़ों के मिलने से ही ,चौराहे भी बन जाते हैं | 


जीवन भी एक सड़क ही तो  है ,

मोड़ों की यहाँ भरमार है ,

पर कहीं -कहीं इन मोड़ों में ,चौराहे ही बन जाते हैं | 


कई बार परिस्थितियों की खातिर ,

हम सब खड़े वहाँ रह जाते हैं ,

जहाँ पर एक-दो नहीं दोस्तों,चार-पाँच रास्ते जाते हैं | 


तब समझ नहीं आता है हमें ,

किस ओर और कहाँ हम जाएँ ? 

किस मोड़ से मिलेगी मंजिल हमें ?सुकूँ कहाँ पा जाते हैं? 


यदि गलत मोड़ आता है तो ,

बर्बाद वो तो कर जाएगा ,

नहीं पाएँगे मंजिल हम ,सुकूँ भी नहीं पा सकते हैं | 

 

कैसा है चौराहा जिंदगी का ? 

काश यहाँ लिखा होता ,

आराम कहाँ मिल सकता है ?सुकूँ कहाँ मिल सकता है ? 

 

Wednesday, December 7, 2022

VISHVAAS ( JIVAN )

 

                         विश्वास 


रिश्ते सभी टिकते हैं बंधु ,आपसी विश्वास पे ,

विश्वास गर है गहरा ,रिश्ता भी होता गहरा ,

विश्वास गर ना हो तो ,रिश्ता भी ढह गया ,

इसीलिए तो बंधु ,विश्वास दे दो तुम ,विश्वास ले लो तुम | 


विश्वास ही है जिसने ,प्रतिमा को  माना ईश्वर ,

विश्वास के जरिए ही ,पत्थर में प्राण फूँके ,

विश्वास के होने से ,आस्था सभी में जागी ,

विश्वास की ही अँगुली को ,चल दो पकड़ के तुम | 


विश्वास है तो बंधु ,प्यार भी पलता है ,

विश्वास के होने से ,साथ भी चलता है ,

विश्वास तुम कर लो तो ,विश्वास भी मिलेगा ,

अन्यथा सोचो तो जरा ,कोई विश्वास क्यों करेगा तुम पे ? 


विश्वास एक पहिया ,जो दुनिया को चलाए ,

विश्वास का ही बंधन ,एक दूसरे को साथ बाँध पाए ,

बंधु बँध जाओ इस बंधन में भी तुम ,

बंधु बँध जाओ इस बंधन में भी तुम | 


MANN ( JALAD AA )

 

               

   मन  (  जलद आ )


खुशियों में मन बावरा ,झूमे ,नाचे ,गाए  ,

मगर देख दुःख की छाया ,मुरझाए ,अकुलाए | 


बदरा जैसा मन मेरा ,पवन संग उड़ जाए ,

चमके जब -जब दामिनी ,जोर से शोर मचाए | 

 

मन की पीड़ा मन ही जाने ,ना जाने दुनिया सारी ,

तेरा मन या मेरा  मन हो ,क्यों पीड़ा से हो भारी ? 


मन की पीड़ा समझे बदरा ,मन जब अश्रु बहाए ,

बदरा का भी दिल पिघले ,छम -छम नीर बहाए | 


बरखा बरसे धरा तृप्त ,मन भी ठंडक पाए ,

तृप्ति का आभास ही ,मन को सुखी बनाए | 


Sunday, December 4, 2022

GUNGUNAAO ( GEET )

  

                       गुनगुनाओ 


जिंदगी की हदों को पार करके ,

बेहद प्यार छलका दो दोस्तों ,

हदें तो होती हैं देशों के बीच ,

उन्हें पार कर जाओ तुम दोस्तों | 


दुनिया जब बनाई उस रचेता ने ,

कोई हद ना उसने तो देखी ,

बेहद दुनिया की रचना की उसने ,

सारी हदें तो मानव ने ही खींचीं | 


खूबसूरती देख दुनिया की ,

मानव बहुत ही मुस्काया ,

प्रकृति ने मुस्कान देखी मानव की ,

खुद को बहुत खिलखिलाया | 


दोस्त बन सभी को प्रेम करो ,

यही सब रचेता  प्रकृति ने सिखाया ,

इस सीख को सदा याद रखो तुम ,

प्रेम भी तो तभी छलछलाया | 


जो जिंदगी मिली है ,है बहुत सुंदर ,

इसलिए तुम सदा गुनगुनाओ ,

सभी के ऊपर तुम प्यार का ,

सदा संगीत सरसराओ |

Thursday, December 1, 2022

ANDAR ( CHANDRAMA )

 

                अंदर  (चंद्रमा )


रात को जब चाँद चमका ,

झाँका  खिड़की से अंदर ,

हमने जब बुलाया मुस्का के ,

आया वो तब खिड़की से अंदर | 


हम दोनों की शुरु हुईं जब बातें ,

हमने कीं वो सारी बातें ,

इतने दिन से जो बातें ,

दबीं थीं दिल के अंदर | 


कहा चाँद ने हमसे तब ,

कई बार देखा करता था ,

मैं तुमको मेरी सखि ,

पर जगा ना पाया मैं तुमको ,

डूबीं थीं तुम निंदिया के अंदर | 


मैं बोली तब मेरे दोस्त ,

रोज़ झाँकती थी मैं खिड़की से ,

रोज़ ढूँढती थी सखा को अपने ,

मगर ना जाने कहाँ गुमे थे ?

कभी दिशा कुछ दूसरी होती ,

कभी शायद बदरा के अंदर |