उलाहना
नदिया की धार दौड़ चल , पहुँच जा सागर - तट पर ,
तेरा मीठा पानी लेकर भी , सागर है खारा ,
ना जाने वो कहाँ से पाता ?
नमक की बड़ी सी गठरी नदिया ,
तेरे मीठे पानी को भी , बना देता है खारा ||
चल - चल - चल , मैं साथ में दौडूँ ,
तेरे साथ - साथ मैं भी , सागर - तट पर पहुँचू ,
उसकी लहरों के साथ - साथ ही ,
मैं भी उछलूँ - कूदूँ ||
सागर सदा बुलाता रहता ,मैं ही ना जा पाती ,
उसकी चंचल - चंचल लहरें , सदा ही मुझे बुलातीं ,
आज तो मौका आया नदिया , तेरे संग हूँ जाती ,
सागर ने भी प्यार से , दिया एक उलाहना ,
आज ही दूर भगाती , उससे मैं मिल आती ||