Thursday, August 6, 2026

DHARAA MUSKAAI ( GEET )

 

                            धरा मुस्काई 


पेड़ों से छनकर , धरा पे धूप जब आई , धरा मुस्काई ,

शीतल सी बयार , कोंपलों से टकराई ,धरा मुस्काई ,

बद्र की रिमझिम बूँदें , धरा से टकराई ,धरा मुस्काई || 


परिंदो की मीठी तान , जग में छाई , धरा मुस्काई  ,

उछलती नदिया की ,छल-छलाहट आई,धरा मुस्काई ,

सागर की लहरों की उछाल , जब आई ,धरा मुस्काई  || 


फूलों की रंगत पर, जब तितलियाँ आईं ,धरा मुस्काई ,

फूलों की महक से ,जब महकी अँगनाई ,धरा मुस्काई ,

साँझ की लालिमा ,जब गगन पे छाई , धरा मुस्काई  || 


रात का अँधियारा छाया ,गगना से चाँदनी उतर आई ,धरा मुस्काई ,

धीरे -धीरे तारों की बारात जगमगाई , धरा मुस्काई ,

सभी कुछ देख जग में ,धरा मुस्काई ,

धरा मुस्काई ,हाँ जी ,धरा मुस्काई  || 




Wednesday, August 5, 2026

RAAT KAA SAMAA ( CHANDRMAA )


                          रात  का समां 


रात का अँधियारा  छाया , धरा और गगना में ,

धरा ने दी आवाज , जो पहुँची गगना तक  ,

चाँद ने सुनी , वह गगना में चमका ,

तारे भी दौड़े - दौड़े आए , चाँद के साथ दोस्तों   || 


धरा मुस्काई उन्हें देखकर  ,

चाँदनी की ओढ़नी , धरा ने ओढ़ी ,

  सारा  जग चमचमा उठा , चाँदनी की चमक से  ,

अँधियारा दूर हुआ , चाँदनी की चमक से दोस्तों  || 


जगवासी रात के अँधियारे में , ये चमक देख मुस्काए ,

उन  सभी की आँखों में , उतर आई एक चमक ,

दिल सभी के गुनगुना उठे , साथ मिलकर  ,

ये ही रात का प्यारा समां है दोस्तों   || 

Tuesday, August 4, 2026

TELIPATHII ( PREM )


                               टेलीपैथी 


दिल ले करीब जो होते हैं  , वही सच्चे दोस्त होते हैं  ,

जो हम को समझते हैं , हम जिनको समझते हैं ,

आपस में हम मुस्कानें बाँटते हैं  || 


रहें पास या दूर , मगर यादों में बसते हैं  ,

कभी भूले नहीं जाते , दिल में समाए रहते हैं  ,

उदासियों में वही दोस्त , तो साथ देते हैं  || 


नहीं जरूरत होती फोन , या मैसेज की दोस्तों  ,

दिल से निकलने वाली , तरंगों से ही काम लेते हैं  ,

उसी को तो दोस्त  , टेलीपैथी कहते हैं  || 

Monday, August 3, 2026

BADARIYAA ( JALAD AA )


                           बदरिया 

संदेसा बदरिया का आया  , सखि आ रही हूँ मैं  ,
दौड़कर आई बाहर मैं  , 
बदरिया मुस्कुरा दी खूब , बोली -- वाह ,
तुझसे मिलने की , मुझे बहुत थी चाह   || 

दोनों हाथ थाम , मेरे आँगन में जा बैठे ,
बतियाते रहे घंटों , वहीं  बैठे - बैठे  , 
ना सुध थी  किसी को , क्या काम है बाकि  ?
बीता पूरा पहर , वहीं बैठे - बैठे  || 

तभी दामिनी चमकती आई , मेरे आँगन में ,
उसकी कड़क सुन , हम हिल गए बैठे - बैठे ,
मुझे भूल कर , बतिया रही हो दोनों  ,
यह सुन कर तो हम , हँस दिए बैठे - बैठे   || 

Sunday, August 2, 2026

MAHSOOS ( PREM )


                               महसूस 


एक सखि थी हमारी , उम्र में हमसे काफी छोटी थी  ,

मगर दिल के बहुत करीब थी ,उम्र रुकावट नहीं थी  || 


जब भी वो दोस्त आती , तो रात को हम दोनों  ,

छत पर तारों की छाँव में बैठते , मुस्कुराते थे  ,

मैंने फूलों के पौधे लगाए थे , हम फूलों की महक लेते थे ,

घंटों बातें करते थे ,और खिलखिलाते थे   || 


हम दोनों में प्यार का , रिश्ता इतना गहरा था ,

कि हम स्वयं को , एक -दूजे के बहुत करीब समझते थे ,

आज भी वो तारों की , छाँव याद आती है , 

आज  भी  वो फूलों की महक , महसूस होती है  ,

आज मेरी वह सखि , इस दुनिया में नहीं है  ,

ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दें  || 

 


MADHUR PYAAR ( RATNAAKAR )

 

                              मधुर  प्यार 

 

जब भी दोस्तों ने पुकारा  , हम चले आए  ,

आज तो रत्नाकर ने दी आवाज  , लो हम चले आए   || 

 

लहरें उछल - उछल कर  , मचल - मचल कर ,

हमारे पास में आईं , हाथ थाम कर  ,

वो ले चलीं , रत्नाकर के द्वार  || 

 

हम भी हँस  दिए , उनकी चपलता पर  ,

और चल दिए , रत्नाकर के द्वार  ,

आज खुल गया था  , रत्नाकर का द्वार  ,

हमने कदम रखा अंदर  , देखा उसका घर - द्वार  || 

 

बसी थी पूरी , नई दुनिया अंदर  ,

जो थी अनदेखी , अनजान मगर सुंदर  ,

नन्हीं मछलियाँ , हमारे इर्द - गिर्द घूम कर  ,

दिखा रहीं थीं  , अपना सुंदर व्यवहार   || 

 

लहरों और मछलियों की चपलता देखकर  ,

हम तो भूल गए अपना संसार  ,

डूब  गए  हम उस  अनोखी दुनिया में  ,

पाकर उन सबका प्यार  , मधुर प्यार   || 

 

Saturday, August 1, 2026

SARHADEN ( DESH )

 

                                 सरहदें 

 

लकीरें रचेता ने सिर्फ , हाथों में बनाईं  ,

एक हाथ में किस्मत की  , दूसरे में अपने कर्म की  ,

मानव ने लकीरें घरों में खींचीं  , ये तेरा घर ,  ये मेरा  घर  ,

घरों के बाद ये लकीरें , देशों की सरहदें बना दी गईं  || 

 

देशों में रहने वाले पहले  , दोस्त हुआ करते थे , 

मगर अब सरहदों के पार , रहने वाले दुश्मन हो गए ,

दोस्तों इन लकीरों को , अपने दिलों पर ना बनाना  ,

नहीं तो दिल भी दुश्मनी में ,डूबकर दूर हो जाएँगे   || 

 

सरहदों के पार रहकर भी , मुस्कान तुम देना  ,

दोस्त ना बना पाओ ,कोई बात नहीं  ,

उन्हें दुश्मन ना बनाना ,

फूलों की खुश्बु  , जैसा हवाओं के साथ ही  ,

दूर से तुम मुस्कुरा कर  , मुस्कानें बिखराओ  ,

बदले में तुम भी मुस्कानें पाओगे   ||