ठहाके
वो दिन कुछ कितने सुंदर थे ? जब हम बच्चे थे दोस्तों ,
ना मोबाईल , ना टी .वी . , ना कम्प्यूटर थे दोस्तों ,
दोस्तों के साथ मिलकर , खेलते थे हम दोस्तों ,
फोन करके नहीं बुलाते थे , आवाज दे कर बुलाते दोस्तों ||
रात को छत पर साथ - साथ सोते थे , गगना की छाँव में ,
चाँद - तारों को देखते हुए , बातें करते हुए सोते थे दोस्तों ,
मुस्कानों के बीच में , खिलखिलाहटें भी सजती थीं दोस्तों ,
बिना फोटो लिए ही ये यादें , जीवन भर मुस्कानें देंगी दोस्तों ||
क्या गुल्ली - डंडे या कंचों की , फोटो ली गई दोस्तों ,
मगर नाम लेते ही , चलचित्र के समान फ्लैश बैक आ जाता है ,
लुका - छिपी और आईस - पाईस खेलते हुए , डैन आने पर ,
सबके छिपने पर , हम तो घर जाकर बैठते थे दोस्तों ,
इंतजार के बाद सभी दोस्त , हमें ढूँढते हुए आते ,
और ठहाके गूँज उठते दोस्तों ||