शून्य
शून्य हूँ मैं शून्य बंधु , गोल - गोल शून्य ,
सभी कहते हैं बंधु , मोल नहीं कुछ शून्य का ,
मगर ना मानूँ मैं , कैसे मानूँ यह बात ?
मैं तो हूँ अनमोल बंधु , मैं तो हूँ अनमोल ||
किसी भी अंक के , पहले लगा तो नहीं है मेरा मोल ,
मगर किसी भी अंक के , आगे लगा तो मैं अनमोल ,
उस अंक का मोल भी बढ़ जाता ,
जो अंक पाए मेरा साथ बंधु ||
लगाते जाओ अंक के आगे शून्य - शून्य ,
मोल बढ़ता - बढ़ता जाएगा उस अंक का ,
जितने शून्य लगाओगे , उतना ही बढ़ेगा मोल ,
चलो बंधु बढ़ा लो , अपने अंक का मोल ,
मुझे लगाते चलो , जोड़ते चलो ,
बन जाओ अनमोल , बंधु बन जाओ अनमोल ||