कड़क दामिनी की
एक बूँद बदरा दे जा ,
मेरे तपते अँगना की ,धरती की प्यास बुझा जा रे ,
अपनी घनी छाया में ,धरती को राहत दे जा रे ,
कब से धरती तपती है , रवि किरणों के तेज से ?
उस तपन को कम कर जा रे ||
अपनी बरखा को तू भिजवा दे , रिमझिम - रिमझिम बरसा दे ,
धरती अपनी खिलखिलाएगी ,तुम्हारे ही गीत गाएगी रे ||
अपना दिल भी खुश हो जाएगा ,खुश होकर ये मुस्काएगा ,
मुस्का के ये गुनगुनाएगा ,जिससे तू भी बदरा खिलखिलाएगा रे ||
तेरी दामिनी भी चमकती जाएगी ,कड़क - कड़क के खिलखिलाएगी ,
पवन भी तुझको गगन में उड़ाएगा ,
दामिनी , पवन के साथ मिलकर ,तू भी जी जाएगा रे ||