सखा सागर
आजा रे सागर तू आजा ,लहरों को संग लेकर आजा ,
मिल के गप्पें मारेंगे ,गीतों का हम समां बाँधेंगे ||
बहुत दिन हुए ,हम सब मिलकर बैठे नहीं ,
नहीं कीं सामने बैठ बातें ,और ना खिलखिलाए ,
आज तो आओ ,कुछ हमारी सुनो ,कुछ अपनी सुनाओ ||
तुम तो हो रत्नों का आकर ( घर ), एक बड़ा सा ,
खजाना है तुम्हारे अंदर ,जीवों का भी बसा है संसार ,
तुम्हारे अंदर ,रंगों का संसार ,सजा है तुम्हारे अंदर ||
सागर तुम हो सखा हमारे , जल का अतुल भंडार हो ,
तुम्हारे इसी जल में ,जीवन उपजा था ,
वही जीवन फिर धरा पे आया , पूरी दुनिया तभी बनी ,
मानव ने सुखी जीवन था पाया ||
मगर सागर एक बात बताओ तुम ,
नदियाँ तो मीठा जल लातीं ,
तेरा घर उनके ही जल से भरता ,
पर तूने उसे नमकीन , क्यों और कैसे बनाया ??