खो गई
एक आलस भरी शाम ,
अँगड़ाई ले कर सो गई ,
रात की चादर में ,
सारी दुनिया खो गई |
सुबह के आँचल की ,
हवा ने जाकर ,सभी को जगाया ,
दुनिया फिर से ,उषा की ,
लालिमा में खो गई |
देख तेरे रूप को ,
आईना थर्रा उठा ,
पर यहाँ पर मैं तो ,
मीठे सपनों में खो गई |
खो गई
एक आलस भरी शाम ,
अँगड़ाई ले कर सो गई ,
रात की चादर में ,
सारी दुनिया खो गई |
सुबह के आँचल की ,
हवा ने जाकर ,सभी को जगाया ,
दुनिया फिर से ,उषा की ,
लालिमा में खो गई |
देख तेरे रूप को ,
आईना थर्रा उठा ,
पर यहाँ पर मैं तो ,
मीठे सपनों में खो गई |
बता कैसे ?
दिल में है तेरी याद ,
होंठों पे तेरा नाम ,
तू ही बता कि कैसे ?
बीते ये मेरी शाम |
मन भी है ये तेरा ही ,
तन भी है ये तेरा ही ,
तू ही बता कि कैसे ?
तन - मन को दूँ इल्जाम |
चाहा नजर ने तुझको ,
पाया नजर ने तुझको ,
तू ही बता की कैसे ?
नजरों को लूँ मैं थाम |
है दूर अब तू मुझसे ,
प्यासी ये नजर तरसे ,
तू ही बता कि कैसे ?
गुजरें ये सुबह शाम |
डायरी मेरी सखि ( 25 / 05 / 2021 )
आज का दिन 25 मई 2021 ,
एक वर्ष पहले भी ये तारीख थी 2020 में ,
वह दिन मेरा था प्रतिलिपि पर ,
पहला दिन था दोस्तों पहला दिन |
आज एक वर्ष पूरा प्रतिलिपि में ,
5000 से अधिक पाठक दोस्त हैं ,
225 से अधिक फॉलो करते दोस्त हैं ,
वाह ! इतने सारे दोस्त हैं |
दोस्तों आप सभी का साथ ,
दोस्तों आप सभी का प्यार ,
रखेगा मुझे प्रतिलिपि परिवार में ,
प्यार पाया है मैंने आप सब के व्यवहार में |
कोरोना का लॉकडाउन ,
घर में कैद ,बाहर ना जाना ,
सारा समय बीतता जा रहा है ,
प्रतिलिपि में बसे दोस्तों के प्यार में |
साथ बना रहेगा और प्यार बना रहेगा ,
तो रास्ता काटना आसान रहेगा दोस्तों ,
मंजिल तक पहुँचना सरल होगा ,
पहले दिन नहीं रहे तो ये भी नहीं रहेंगे ,
नई सुबह का सूरज जल्दी उगेगा दोस्तों ,
पढ़ने ,लिखने के साथ ही मुस्कुराहटें होंगी दोस्तों |
मुस्कान किताबें
ज्ञान का भंडार किताबें ,
विज्ञानं की हैं खोज किताबें ,
मनोरंजन का संसार किताबें ,
जीवन का हैं तार किताबें |
बिना किताबें जग है सूना ,
बिना किताबें मन है सूना ,
बिना किताबें स्वर है सूना ,
स्वर की तो हैं ताल किताबें |
बिना किताबें युग ना जाने ,
बिना किताबें इतिहास ना जाने ,
बिना किताबें लय ना जाने ,
लय की तो हैं झंकार किताबें |
बिना किताबें किसने ,क्या खोजा ?
बिना किताबें किसने ,क्या लिखा ?
बिना किताबें कौन ,कब आया ?
इन सब का हैं सार किताबें |
बिना किताबें कैसी कहानी ?
बिना किताबें कैसी कविता ?
बिना किताबें लेखक कौन ?
कविताओं का भाव किताबें |
मनोरंजन सूना हो जाए ,
गीत ,गान कोई कैसे गाए ?
नृत्य ,ताल के बिना हो कैसे ?
मनोरंजन की मुस्कान किताबें |
तुम भी पढ़ लो ,हम भी पढ़ लें ,
उन को अपने दिल में गुन लें ,
उनकी खामोश आवाज को सुन लें ,
ले लो झोली भर - भर यार किताबें |
भुला के
संसार की हर शय को ,
पाया है तुझे पा के ,
तेरी बाँहों में आई हूँ ,
दुनिया को मैं भुला के |
जीवन के रास्ते में ,
चलती हूँ इस तरह से ,
चलता हो कोई राही ,
मंजिल को अपनी पा के |
खुशियाँ मेरे दामन में ,
यूँ भर गईं हैं साजन ,
ज्यूँ बहार ठहर जाए ,
गुलशन में किसी जा के |
खुशियाँ मिलें सभी तुझे ,
हर तमन्ना हो पूरी तेरी ,
तेरी ख़ुशी को ढूँढूँगी ,
मैं जिंदगी गँवा के |
होंठ मुस्कुराए
निगाहें उठीं ,और झुक गईं ,
नजरें मिलीं ,और बच गईं |
होंठ हिले ,मगर बंद ही ,
लव्ज खिले ,मगर मंद ही |
मौन छूटा नहीं ,सन्नाटा टूटा नहीं ,
आखिर तुम ही बोले ,चलो होंठ तो खोले |
कहा बोलने को ,पर मैं क्या बोलती ?
दिल में ,बातें बहुत थीं ,पर होंठ ,कैसे खोलती ?
बस एक बार फिर ,पलकें उठीं ,नजरें मिलीं ,
और होंठ मुस्कुराए ,मगर मंद - मंद ही |
ख़ामोशी
ख़ामोशी ,प्यार भरी ,
फैली है बीच में ,
दो दिल हैं पास - पास ,
बाँहों का बंधन है ,
नज़रों का संगम है |
साँसों की सरगम पर ,
भावनाओं के उतार -चढ़ाव ,
कह जाते हैं दिल की बात ,
जरूरत ना शब्दों की ,
जरूरत दिल की धड़कन की |
अधखुले होंठ और ,
अधमुंदीं पलकें ही ,
लव्ज बन जाते हैं ,
पपड़ाए होंठ ही ,
गरम साँसों के इकरार का ,
माध्यम बन जाते हैं |