Tuesday, June 30, 2026

DWAAR SAAGAR KAA ( RATNAAKAR )

 

                         द्वार सागर का 

 

सागर मैं आई हूँ  , तू हाथ बढ़ा अपना  ,

थाम कर  मेरा हाथ , खोल दे द्वार अपना  ,

मैं कैसे पहचानूँ  ? खुद ही तेरे द्वार को , 

कहीं भी किवड़िया नहीं है  , ना कोई कुंडी ही है   || 

 

ना कोई घंटी ही है सागर    ,

हर  ओर  लहरें उछल रही हैं  ,

उन्हीं का शोरगुल   बहुत है   || 

 

लहरों को बोल सागर  , रस्ता मुझे दिखाएँ  ,

अंदर मुझे हाथ थाम कर ले जाएँ  ,

तेरे ही कहने पर , वो ले जाएँगी मुझे  ,

वरना तो वो चंचला , भिगोती हैं सिर्फ मुझे  ,

खेल खिलाती हैं मुझे , प्यार दिखाती हैं मुझे   || 

 

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