द्वार सागर का
सागर मैं आई हूँ , तू हाथ बढ़ा अपना ,
थाम कर मेरा हाथ , खोल दे द्वार अपना ,
मैं कैसे पहचानूँ ? खुद ही तेरे द्वार को ,
कहीं भी किवड़िया नहीं है , ना कोई कुंडी ही है ||
ना कोई घंटी ही है सागर ,
हर ओर लहरें उछल रही हैं ,
उन्हीं का शोरगुल बहुत है ||
लहरों को बोल सागर , रस्ता मुझे दिखाएँ ,
अंदर मुझे हाथ थाम कर ले जाएँ ,
तेरे ही कहने पर , वो ले जाएँगी मुझे ,
वरना तो वो चंचला , भिगोती हैं सिर्फ मुझे ,
खेल खिलाती हैं मुझे , प्यार दिखाती हैं मुझे ||
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