हलाहल
शिव ने जब पिया हलाहल , धरा को बचाया उससे ,
अपने कंठ में ही रोक लिया ,धरा को बचाया उससे ,
धरावासियों ने उनको पुकारा , नीलकंठ के नाम से ||
बचा लिया शिवशंकर ने , धरा को एक विनाश से ,
मगर जब भगीरथ गए , और प्रार्थना की गंगा से ,
जब गंगा राजी हुईं तब ,शिव ने ही अपनी जटाओं में ,
समाया गंगा की लहरों को , और बचाया गंगा बहाव से ||
ऐसे ही शिवशंकर को ,हमारा प्रणाम है ,
उन्हीं को हम शीश नवाते हैं , नमन करते हैं ,
जय -जय , जय - जय , हे शिवशंकर ,
दो आशीष हमें , दो आशीष हमें ||
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