रत्नाकर
सागर ने दी आवाज , लो सागर मैं आ गई ,
लहरें अपनी चंचलता लेकर , सागर तट पार कर गईं ,
सागर उन्हें रोकता रहा , मगर कौन रोक पाया है ?
उन चंचला लहरों को , जो दौड़ती , खेलती रहीं ||
लहरों ने हाथ थामा , एक - दूजे की ओर दौड़ पड़ीं ,
सागर की आवाज और उसकी , पाबंदी भी उन्हें रोक ना पाई ,
उन चंचला लहरों को , कौन बाँध पाया हैं ?
वो तो आजाद हैं , वो तो आजाद हैं ||
शक्तिशाली सागर अपनी ही , लहरों से मानो हार गया ,
सागर तो तट बंध को , तोड़ नहीं सकता ,
मगर लहरें तो उछलती - कूदती , दौड़ती जाती हैं ,
तट बंध को पार कर जाती हैं , और खिलखिलाती हैं ||
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