प्रकाश - पुंज
साँझ ने जब रात , हाथ मिलाया , अँधियारा छाया ,
उजियारे की कोई किरन , नहीं थी राहों में ,
दो - चार कदम चले ही थे हम ,कि प्रकाश -पुंज चमक उठा ,
गगना पे चंद्रमा चमक उठा , धरा तक चाँदनी पहुँच गई ,
धरा तो पूरी की पूरी , चंदनिया से भीग गई ||
हम भी चंदनिया में नहा गए , आँखें भी चमक उठीं ,
दिल भी मुस्कुराया दोस्तों , धड़कनें भी बढ़ गईं ,
आस - पास कलियाँ खिल गईं , बगिया भी महक गई ,
संसार ही मानो महक से भर गया ,
चमन भी तितलियों से भर गया ,
गगना का चाँद भी , मुस्कुरा उठा दोस्तों ||
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