संदेसा बदरिया का आया , सखि आ रही हूँ मैं ,
दौड़कर आई बाहर मैं ,
बदरिया मुस्कुरा दी खूब , बोली -- वाह ,
तुझसे मिलने की , मुझे बहुत थी चाह ||
दोनों हाथ थाम , मेरे आँगन में जा बैठे ,
बतियाते रहे घंटों , वहीं बैठे - बैठे ,
ना सुध थी किसी को , क्या काम है बाकि ?
बीता पूरा पहर , वहीं बैठे - बैठे ||
तभी दामिनी चमकती आई , मेरे आँगन में ,
उसकी कड़क सुन , हम हिल गए बैठे - बैठे ,
मुझे भूल कर , बतिया रही हो दोनों ,
यह सुन कर तो हम , हँस दिए बैठे - बैठे ||
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