खिलीं
मेरे कर्मों ने पूछा मुझसे , " क्यों हमें किया तुमने ?
हमने तो मुस्कानें बाँटीं , दूजों के होठों पर ,
हमने तो है जोत जलाई , जरूरत के आँगन में ,
तुमने ही तो हाथ दिए , हम सबको ये करने में ||
" बुद्धि तुम्हारी , हाथ तुम्हारे , किया है तुमने हमें ,
ईश्वर भी तो हुआ है खुश , हमको यूँ करने में ,
हम हैं कर्म तुम्हारे सखि ,जो रहते थे पहले दिल में ,
वहाँ से निकल , तुमने हमें किया , हम भी हुए सुंदर || "
कर्मों की बातें सुनकर , मेरे होठों पर मुस्कान खिली ,
मेरी मुस्कान देखकर दोस्त , दूजों की मुस्कान खिलीं ,
आज हुआ है दिल खुश सबका , सबकी जो मुस्कान खिलीं ||
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