कर्ण की व्यथा
क्यों छोड़ दिया तुमने मुझे ,नदिया की धार पे ?
क्या मैंने तुमसे कुछ माँगा था , अपने दो हाथों में ?
जीवन भी तुमने दिया था , सिर्फ अपनी मर्जी से ,
क्या मैंने वह जीवन भी तुमसे , माँगा था पुकार के ??
बाकी पुत्रों को जन्म दिया , पाल - पोस कर बड़ा किया ,
क्या मैं नहीं था तुम्हारे , शरीर का अंश जो फेंक दिया ?
मैं क्यों तुम्हें अपनी माँ पुकारूँ , अपनी जुबान से ?
मेरी माता तो राधा है , जिसने पाला अपने आँचल में ||
राजकुमारों के द्वंद्व युद्ध में जब , मेरा अपमान हुआ ,
तुमने तो तब भी मुँह फेर लिया , अपने ही अंश से ,
तब तो वही राजकुमार आगे आया , मेरे अपने पक्ष में ,
वो था बुरा तुम्हारे पुत्रों के लिए , मेरा तो वह दोस्त है ||
तो क्यों आज मैं उसका हाथ छोड़ूँ , जो मेरा दोस्त है ?
आज उसे मेरी जरूरत है , अपने दोस्त की ,
मैं जान देकर भी उसकी , मदद करूँगा ,मदद करूँगा ,
मैं राधेय था , राधेय हूँ , राधेय ही रहूँगा ||
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