Thursday, January 8, 2026

KARNN KII VYATHAA ( KSHANIKAA )

 

                          कर्ण की व्यथा 

 

क्यों छोड़ दिया तुमने मुझे  ,नदिया की धार पे   ?

क्या मैंने तुमसे कुछ माँगा था , अपने दो हाथों में  ?

जीवन भी तुमने दिया था  , सिर्फ अपनी मर्जी से ,

क्या मैंने वह जीवन भी तुमसे , माँगा था पुकार के   ??

 

बाकी पुत्रों को जन्म दिया  , पाल - पोस कर बड़ा किया  ,

क्या मैं नहीं था तुम्हारे , शरीर का अंश जो फेंक दिया  ?

मैं क्यों तुम्हें अपनी माँ पुकारूँ , अपनी जुबान से   ?

मेरी माता तो राधा है  , जिसने पाला अपने आँचल में  || 

 

राजकुमारों के द्वंद्व युद्ध में जब , मेरा अपमान हुआ  ,

तुमने तो तब भी मुँह फेर लिया , अपने ही अंश से  ,

तब तो वही राजकुमार आगे आया  , मेरे अपने पक्ष में ,

वो था बुरा तुम्हारे पुत्रों के लिए , मेरा तो वह दोस्त है   || 

 

तो क्यों आज मैं उसका हाथ छोड़ूँ , जो मेरा दोस्त है  ?

आज उसे मेरी  जरूरत है , अपने दोस्त की  ,

मैं जान देकर भी उसकी , मदद करूँगा ,मदद करूँगा ,

मैं राधेय था , राधेय हूँ  , राधेय ही रहूँगा   || 

 

 

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