प्यास
आज तो बदरा बरसे , पूरी रात सखि ,
रत्नाकर की प्यास बुझाई ,
कहाँ से लाए इतना जल ?
जिससे भर पाया पूरा रत्नाकर ||
लहरें रत्नाकर की , खेल रही होंगी ,
उछल - उछल कर खेल रही होंगी ,
सबको ही पास बुला रही होंगी ,
मुस्कानें सब में बाँट रही होंगी ||
बदरा से इतना जल लेकर ,
रत्नाकर तुम आओ मेरे पास ,
हम दोनों साथ मिल कर बैठेंगे ,
मिल - जुल कर दिल की बात करेंगे ||
तुम अपनी सुनाना और मेरी सुनना ,
आपस में एक - दूजे की ,
जिंदगी के बारे में जानेंगे ,
और दोस्ती में डूब जाएँगे ||
No comments:
Post a Comment