Monday, May 31, 2021

BARASA SAVAN ( JALAD AA )

 

जलद  आ   ( बरसा सावन )


हर साल आया सावन ,भीग गया तन ,

इससे पहले क्यों नहीं ,भीगा मेरा मन ? 


हर साल बरखा बरसी ,हर साल छायी बदली ,

इन सबसे पहले ही मैं ,क्यों नहीं मचली ? 


बिजली चमकती थी ,बादल गरजते थे ,

क्यों नहीं मेरे नयन ,पहले से सरसते थे ? 


इन सबका एक उत्तर ,इन सबका एक कारण ,

इससे पहले नहीं कभी ,मिले मुझे साजन | 


JHUKAAE ( GEET )

 

                झुकाए 

 

तेरे प्यार के इंतजार में हम ,

कुछ कह ना सके हँसते ही रहे ,

मिला तू सितमगर तो सामने ,

आकर पलकें झुकाए बैठे रहे | 


पलकें उठीं तो सामने था तू ,

झूठा सपना कोई नहीं था ,

तेरी हँसी सूरत पे लेकिन ,

प्यार का कोई बोल नहीं था ,

तेरे एक बोल को सुनने की ,

आस लगाए बैठे रहे | 


तेरे लब की मुस्कानों पर ,

कर दीं निछावर सारी खुशियाँ ,

तेरे एक - एक बोल से तो अब ,

खिल गईं मेरे दिल की कलियाँ ,

लब पर थी मुस्कान मगर ,

नज़रों को झुकाए बैठे रहे | 


Sunday, May 30, 2021

AARMAN ( SMALL POEM )

 

          अरमां 

 

दिल के अरमां मचल गए ,

     ख्वाब सुनहरे संभल गए ,

          आज ख़ुशी के मौके पर ,

               दो आँसू भी निकल गए | 

 

चाँद क्षण गुजरे तेरी याद में ,

     वो ही तो लाए खुशियाँ ,

          जीवन की राहों पर तेरी ,

                बिखरें मुस्कानों की कलियाँ | 

 

कोई खुश्बू कोई महक ,

    नहीं मेरे पास जो दूँ तुझे ,

          बस एक दिल है मेरे पास ,

                वही सौंप देती हूँ तुझे | 

 

तुम जो पास होते मेरे ,

     देती ये दुआएँ सामने से ,

          अरे ये क्या कह गई मैं ? 

                तुम बैठे तो हो मेरे सामने ,

                     ख्यालों में तो तुम ही तुम हो | 

     

NAHIN JANA ( CHANDRAMA )

 

       नहीं जाना 

 

तनहाईयों  आँचल ढलका ,

   नहीं जाना किसी ने भी ,

किसी की याद में दिल तड़पा ,

     नहीं जाना किसी ने भी | 

 

तेरा जो प्यार था पाया ,

     उसी की याद है अब तो ,

उन्हीं यादों का साया जब सरका ,

     नहीं जाना किसी ने भी | 

 

तेरी बातों की यादें हैं ,

     मेरे लब पे जो आहें हैं ,

लब पर मेरे ये गीत जब अटका ,

     नहीं जाना किसी ने भी | 

 

खुली जुल्फों के साये में ,

      ये सुबह शाम हो जाती ,

मगर ये चाँद जब चमका ,

      नहीं जाना किसी ने भी | 

 

तेरी राहों में बैठे हैं ,

    है दिल में आस छोटी सी ,

अगर तुम आज आ जाते ,

      वो हो जाती अभी पूरी ,

किया हमने अभी सजदा ,

      नहीं जाना किसी ने भी | 

 

Saturday, May 29, 2021

MANAAOON KAISE ? ( GEET )

 

             मनाऊँ कैसे ? 

 

फागुन तुझे मनाऊँ कैसे ? 

प्रियतम घर नहीं आए मेरे ,

अपना रूप सजाऊँ कैसे ? 

 

बिंदिया माथे की हँस देगी ,

मेंहदी हाथों की रंग देगी ,

तू ही बता हाथों की ,

चूड़ी को खनकाऊँ कैसे ? 


रंग आँख कधुँधला सा है ,

और अधर हैं रंगहीन से ,

जान गई थी साजन रूठे ,

फिर भी नयन क्यूँ हो गए गीले ?

ऐसे विरही मौसम में ,

नयन सुधा बरसाऊँ कैसे ?


तन हैं गीले सबके रंग से ,

मेरे नयन भरे हैं जल से ,

बता दे कोई मुझको इतना ,

अंग पे रंग लगाऊँ कैसे ? 

फागुन तुझे मनाऊँ कैसे ? 


DIL ME KHILE ( GEET )

 

           दिल में खिले 

 

मेंहदी रची हथेलियों पर ,

    जब झुकी उनकी नजर ,

         दिल में खिल गए सौ कमल | 

 

देख कर  उनकी नजरों में प्यार ,

     दिल मेरा हुआ बेक़रार ,

 बेक़रार  दिल से ,ना पाए वो निकल ,

     दिल में खिल गए सौ कमल |         


नजरें झुकीं थीं मेरी पर ,

     बेताब थीं देखने को उन्हें ,

देखा जो सामने ,तो वो रहे थे संभल ,

      दिल में खिल गए सौ कमल | 


कह ना पाई उनसे कुछ ,

     दिल की दिल में ही रही ,

उनकी बातें सुन के ही ,मन मेरा गया मचल ,

        दिल में खिल गए सौ कमल | 


Friday, May 28, 2021

KYAA DOON ? ( GEET )

 

                    क्या  दूँ  ?

 

साजन मेरे तुम्हीं हो ,दिलबर हो तुम मेरे ,

इसके सिवा कहो तुम्हीं ,क्या नाम दूँ तुम्हें ? 

 

तकदीर तुमको माना ,तदबीर तुमको जाना ,

इसके सिवा कहो तुम्हीं ,क्या मान लूँ तुम्हें ? 

 

मेरे दिल की आरजू हो ,मेरे मन की तुम ख़ुशी हो ,

इसके सिवा कहो तुम्हीं ,क्या सोच लूँ तुम्हें ? 

 

पाकर तुम्हें पाया है ,दोनों जहान को ,

इसके सिवा कहो तुम्हीं ,क्या इच्छा हो मुझे ? 

 

ये मन तुम्हीं को सौंपा ,ये तन तुम्हीं  सौंपा ,

इसके सिवा कहो तुम्हीं ,क्या सौंप दूँ तुम्हें ? 

 

 

HAM MUSKAE ( JALAD AA )

 

 हम मुस्काए  ( जलद आ ) 

 

दिल का दर्द छिपा कर ,हम मुस्काए ,

अंदर तक ये कसक छिपी थी ,तुम ना आए | 

 

छा गईं घटाएँ अंबर में ,

तब चलीं हवाएँ तपन लिए ,

ऐसे में आई याद तेरी ,

तब से ये दिल है जलन लिए ,

उस जलन को पीकर हम मुस्काए | 

 

हर पल किया तेरा ,

        इंतजार हमने ,

देखे हमने कितने ?

           सुंदर सपने ,

सपने जो टूटे तो हम मुस्काए | 


Wednesday, May 26, 2021

KHO GAI

 

            खो गई 

 

एक आलस भरी शाम ,

      अँगड़ाई ले कर सो गई ,

            रात की चादर में ,

                  सारी दुनिया खो गई | 


सुबह के आँचल की ,

     हवा ने जाकर ,सभी को जगाया ,

         दुनिया फिर से ,उषा की ,

               लालिमा में खो गई | 


देख तेरे रूप को ,

     आईना थर्रा उठा ,

          पर यहाँ पर मैं तो ,

               मीठे सपनों में खो गई | 

     

Tuesday, May 25, 2021

BATAA KAISE ? ( JIVAN )

 

          बता कैसे ? 


दिल में है तेरी याद ,

   होंठों पे तेरा नाम ,

      तू ही बता कि कैसे ? 

           बीते ये मेरी शाम | 


मन भी है ये तेरा ही ,

     तन भी है ये तेरा ही ,

          तू ही बता कि कैसे ? 

               तन - मन को दूँ इल्जाम | 


चाहा नजर ने तुझको ,

    पाया नजर ने तुझको ,

        तू ही बता की कैसे ? 

              नजरों को लूँ मैं थाम | 


है दूर अब तू मुझसे ,

    प्यासी ये नजर तरसे ,

         तू ही बता कि कैसे ? 

               गुजरें ये सुबह शाम | 


Monday, May 24, 2021

PRATILIPI SANG EK SAAL ( DAAYARI - 25/05/2021 )

 

 डायरी मेरी सखि    ( 25 / 05 / 2021 ) 

 

आज का दिन  25   मई  2021 , 

एक वर्ष पहले भी ये तारीख थी 2020 में ,

वह दिन मेरा था प्रतिलिपि पर ,

पहला दिन था दोस्तों पहला दिन | 

 

आज एक वर्ष पूरा प्रतिलिपि में ,

5000 से अधिक पाठक दोस्त हैं ,

225 से अधिक फॉलो करते दोस्त हैं ,

वाह ! इतने सारे दोस्त हैं | 

 

दोस्तों आप सभी का साथ ,

दोस्तों आप सभी का प्यार ,

रखेगा मुझे प्रतिलिपि परिवार में ,

प्यार पाया है मैंने आप सब के व्यवहार में | 

 

कोरोना का लॉकडाउन ,

घर में कैद ,बाहर ना जाना ,

सारा समय बीतता जा रहा है ,

प्रतिलिपि में बसे दोस्तों के प्यार में | 

 

साथ बना रहेगा और प्यार बना रहेगा ,

तो रास्ता काटना आसान रहेगा दोस्तों ,

मंजिल तक पहुँचना सरल होगा ,

पहले दिन नहीं रहे तो ये भी नहीं रहेंगे ,

 नई सुबह का सूरज जल्दी उगेगा दोस्तों ,

पढ़ने ,लिखने के साथ ही मुस्कुराहटें होंगी दोस्तों | 

 

  

Sunday, May 23, 2021

MUSKAAN KITABEN ( KSHANIKA )

 

 

          मुस्कान  किताबें 

 

ज्ञान का भंडार किताबें ,

   विज्ञानं की हैं खोज किताबें ,

      मनोरंजन का संसार किताबें ,

         जीवन का हैं तार किताबें | 

 

बिना किताबें जग है सूना ,

   बिना किताबें मन है सूना ,

       बिना किताबें स्वर है सूना ,

           स्वर की तो हैं ताल किताबें | 


 बिना किताबें युग ना जाने ,

     बिना किताबें इतिहास ना जाने ,

        बिना किताबें लय ना जाने ,

           लय की तो हैं झंकार किताबें | 


बिना किताबें किसने ,क्या खोजा ? 

   बिना किताबें किसने ,क्या लिखा ? 

      बिना किताबें कौन ,कब आया ? 

          इन सब का हैं सार किताबें | 


बिना किताबें कैसी कहानी ? 

    बिना किताबें कैसी कविता ? 

       बिना किताबें लेखक कौन ? 

            कविताओं का भाव किताबें | 


मनोरंजन सूना हो जाए ,

   गीत ,गान कोई कैसे गाए ? 

      नृत्य ,ताल के बिना हो कैसे ? 

          मनोरंजन की मुस्कान किताबें | 


तुम भी पढ़ लो ,हम भी पढ़ लें ,

    उन को अपने दिल में गुन लें ,

        उनकी खामोश आवाज को सुन लें ,

            ले लो झोली भर - भर यार किताबें | 


Wednesday, May 19, 2021

BHULAA KE ( GEET )

 

              भुला के 

 

संसार की हर शय को ,

   पाया है तुझे पा के ,

       तेरी बाँहों में आई हूँ ,

            दुनिया को मैं भुला के | 

 

जीवन के रास्ते में ,

    चलती हूँ इस तरह से ,

         चलता हो कोई राही ,

              मंजिल को अपनी पा के | 

 

खुशियाँ मेरे दामन में ,

    यूँ भर गईं हैं साजन ,

        ज्यूँ बहार ठहर जाए ,

             गुलशन में किसी जा के | 

 

खुशियाँ मिलें सभी तुझे ,

    हर तमन्ना हो पूरी तेरी ,

        तेरी ख़ुशी को ढूँढूँगी ,

              मैं जिंदगी गँवा के | 

 

Tuesday, May 18, 2021

HONTH MUSKURAE ( SHORT POEM )

 

            होंठ मुस्कुराए 

 

निगाहें उठीं ,और झुक गईं ,

नजरें मिलीं ,और बच गईं | 

 

होंठ हिले ,मगर बंद ही ,

लव्ज खिले ,मगर मंद ही | 

 

मौन छूटा नहीं ,सन्नाटा टूटा नहीं ,

आखिर तुम ही बोले ,चलो होंठ तो खोले | 

 

कहा बोलने को ,पर मैं क्या बोलती ? 

दिल में ,बातें बहुत थीं ,पर होंठ ,कैसे खोलती ? 

 

बस एक बार फिर ,पलकें उठीं ,नजरें मिलीं ,

और होंठ मुस्कुराए ,मगर मंद - मंद ही | 

 

Monday, May 17, 2021

KHAAMOSHII ( PREM GEET )

 

             ख़ामोशी

 

ख़ामोशी ,प्यार भरी ,

    फैली है बीच में ,

        दो दिल हैं पास - पास ,

            बाँहों का बंधन है ,

                नज़रों का संगम है | 

 

साँसों की सरगम पर ,

    भावनाओं के उतार -चढ़ाव ,

        कह  जाते हैं दिल की बात ,

             जरूरत ना शब्दों की ,

                 जरूरत दिल की धड़कन की | 


अधखुले होंठ और ,

     अधमुंदीं पलकें ही ,

         लव्ज बन जाते हैं ,

             पपड़ाए होंठ ही ,

                 गरम साँसों के इकरार का ,

                     माध्यम बन जाते हैं | 


Saturday, May 15, 2021

MAA ( MOOD OF THE MONTH )

  

                  माँ 

 

माँ तो माँ है ,जननी है ,

बच्चों की सुख करनी है | 

 

हरेक राह में दीप जलाए ,

अपने बच्चों को राह दिखाए ,

सब कुछ उनको सिखलाए ,

प्रेम ,प्यार उनपे बरसाए ,

ऐसी वो सुख करनी है | 

 

अपना सब आराम त्याग दे ,

अपना सब सुख ,चैन त्याग दे ,

तन ,मन ,धन सब कुछ वार दे ,

बच्चों को सपनों का संसार वार दे ,

अपनी सब मुस्कान वार दे ,

ऐसी वो सुख करनी है | 

 

बच्चों का दुःख हर लेती है ,

दुनिया में हर माँ ऐसी है ,

खुशियों से जीवन भर देती है ,

जीवन मार्ग प्रशस्त कर देती है ,

रंगों से जीवन भर देती है ,

ऐसी वो सुख करनी है | 

 

नमन है माँ को ,नमन जननी को ,

हे ईश्वर उनकी आत्मा को शांति देना ,

नमन ,नमन माँ ,नमन ,नमन | 

 

Tuesday, May 11, 2021

LAGAA EISA ( GEET )

 

               लगा ऐसा 

 

रात के आलम में ,ख़ामोशी के माहौल में , 

एक स्वर ,उभरा अचानक ,

पाया की अपनी ही ,चूड़ियाँ खनक गईं | 


लगा ऐसा कि जैसे तुमने ,चूड़ियों को छेड़ा था ,

चमकते सूरज की ,फैली धूप में एकाएक ,

कहीं से अंधकार छा गया,

लगा आकाश पर बदली छा गई | 

 

मगर ये तो मेरी जुल्फें हैं ,लगा ऐसा कि जैसे ,

तुमने ,हाँ ! तुमने ही ,जुल्फों को बिखराया | 

 

तभी आत्मा में कोई स्वर उभरा ,

लगा ऐसा कि जैसे ,तुमने मुझे पुकारा ,

सुनकर पुकार साजन की ,

समझी कि तुम हो आए | 


पलकें जो मैंने खोलीं ,खुद को अकेला पाया ,

जाना ये ख्वाब था सब ,तुम नहीं हो अब आए | 


 



MUKTAK --- 4

 

मुक्तक ---4 

 

1 )

   याद तेरी सताती है ,

     सामने आ जाओ तो ,

         नजर झुक जाती है ,

              तू ही बता मैं क्या करूँ ? 

                    बरखा ही तो जलाती है | 

2 )

    ऐ रुकिए जरा सुनिए ,

        हमारे दिल की दास्तां ,

             ना रुके आप तो फिर देखिए ,

                   फिर हम भी चल देंगे |  

Sunday, May 9, 2021

KAATIL CHANDA ( CHANDRAMA )

 

 

   चंद्रमा   (कातिल चंदा  ) भाग - 9 

 

आग के सीने में ,दहकते हुए अंगारे हैं ,

सिंदूरी रात के आँचल में ,

                     चमकते हुए सितारे हैं | 

 

आग के सीने में ,तपन नहीं है ,

रात के आँचल में ,

                     आज चाँद जो नहीं है | 


चाँद छिप गया है ,कातिल बन कर ,

आग सीने में भड़की है ,

                        ज्वाला बन कर | 


Saturday, May 8, 2021

JANANI HAMARI ( DESH )

 

      जननी हमारी 


मातृ भूमि , तो माँ है हमारी ,

    जिस पर हमने जन्म लिया ,

      जिस की गोद में पले बढ़े ,

         पालन - पोषण है जिसने किया ,

             उसकी हम संतान हैं ,

                 करते उसका गुणगान हैं | 

 

मातृ भूमि को करें सलाम ,

  उसको शीश झुकाते हम ,

     नमन करें नित उसको हम ,

        वो तो अपनी माता है ,

          आशीर्वाद मिला उसका ,

             उसी के कारण हम फूले -फले ,

                तभी तो करते हम गुणगान हैं | 

 

प्रकृति तो मातृ भूमि का हिस्सा ,

  जिसने जीवन संसाधन हमें दिए ,

   हँस के हमको गले लगाया ,

     सब साधन भरपूर दिए ,

        इसीलिए तो हम सब बंधु ,

           करते उसका गुणगान हैं | 

 

माँ है ,जननी  है ,जीवन दायिनी हमारी ,

  जन्म की पीड़ा सही है जिसने ,

    चलना ,दौड़ना सिखाया हाथ पकड़ ,

       बोलना ,खाना - पीना सिखाया ,

          पढ़ा -लिखा कर खड़ा किया ,

             करते हम उसका गुणगान हैं | 

 

जननी जन्म भूमिश्च ,स्वर्गादपि गरीयसि | 

 

Friday, May 7, 2021

RAS BARASA ( GEET )

 

        रस बरसा 

 

सारी रात जागी मैं साजन ,

पायल छनकी जो बैरन --- | 

 

लाज के मारे बोल ना पाई ,

तेरे बोल ने सुध बिसराई ,

लाज छोड़ कर होंठ जो खोले ,

बोली चिरैया बैरन --| 

 

रस बरसा यूँ रतिया सारी ,

भूल गई मैं दुनिया सारी ,

लेकिन उसमें डूब ना पाई ,

भोर उतर आई आँगन -- | 

 

तड़प लिए ये दिल ना माना ,

दर्द को मैंने अपना जाना ,

पर इतना भी पाती कैसे ? 

मन में रही ना तड़पन -- | 

 

Thursday, May 6, 2021

PYAAR TERAA ( GEET )

 

                  प्यार  तेरा

 

पाया जो तेरा प्यार ,तमन्ना नहीं है कोई , 

मिल जाए जैसे मंजिल न,रातों को मैं यूँ सोई | 


दर्दो आलम का रास्ता ,ना हमने तय किया ,

ग़म की किसी मंजिल ने ,ना हम पे करम किया ,

तनहाईयों की महफ़िल ,आई थी पास मेरे ,

दूरी पर यूँ रुकी वो ,झटका लगा हो कोई | 


तू प्यार से देखे जा ,और हम मुस्कुराएँ ,

हमको ना तू भुलाए और ,तुझे ना हम भुलाएँ ,

मंजिल पे ना पहुँचें ,राहों में चलते जाएँ ,

ये दुनिया सारी समझे ,भटका है राह कोई | 


Wednesday, May 5, 2021

KHYAAL ( GEET )

 

                     ख्याल 

 

तनहाईयों में अकसर ये सोचती थी मैं , 

जब तुम मिलोगे मुझसे तो क्या करूंगी मैं?

तेरे ख्याल का वजूद है मेरे दिल में ,

तुमको हमेशा यूँ ही देखा करूंगी मैं | 


दिल ने तुम्हीं को चाहा अब तक की जिंदगी में ,

आगे भी प्यार केवल तुमसे करूंगी मैं ,

तेरे विशाल नयनों में खो जाऊँ पंछी बन के ,

इस जहाँ में रहकर अब क्या करूंगी मैं ? 


तेरे आगोश में ही सिमट आई मेरी दुनिया ,

अब इनसे दूरियाँ ना गँवारा करूँगी मैं ,

गर कोई नाम पूछे चितचोर का मेरे ,

तुम्हारी तरफ ही तब तो इशारा करूँगी मैं | 


मुझको ना भूलना तुम ना मुझसे जुदा होना ,

ये ख्याल रहे कि ऐसे ना जिंदा रहूँगी मैं ,

तकदीर हमें लाई ज्यूँ इस जनम में साथ ,

अगले जनम में भी तुम्हें पाया करूँगी मैं | 


Tuesday, May 4, 2021

DAAYARI MERI SAKHI ( 05/05/2021 )

 

     डायरी मेरी सखि ( 05 /05 /2021  ) 

 

मेरी प्यारी सखि ,

सुनो सखि एक बात बताऊँ ,

    आज तो मेरा जन्म दिन है ,

         मस्ती कर रही हूँ ,

              सभी की शुभकामनाओं से ,

                     आँचल भर रही हूँ | 


बच्चों के प्यार से ,

      परिवार के दुलार से ,

           दोस्तों की खिलकार से ,

                  आप सबके स्नेह से ,

                        दिल को भर रही हूँ | 

 

छोटा सा मेरा घरोंदा ,

     भर गया है मुस्कानों से ,

          बच्चों की चहचहानों से ,

               दोस्तों की खिलकानों से ,

                    अपने जीवन को भर रही हूँ | 

फिर मिलेंगे सखि ----  | 

 

 

Monday, May 3, 2021

DAAYARI MERI SAKHI ( 04/05/2021 )

 

         डायरी मेरी सखि  ( 04 /05 /2021 )

मेरी सखि ,

कॉलेज के थे मस्ती भरे दिन ,शरारतों के दिन ,

शरारतों की सोच -सोच ,नए आईडिया के दिन | 

 

मैं और मेरी सखि ,सुबह संग जाते थे कॉलेज ,

समय से पहले पहुँचते ,शरारतें करने के कारण | 

 

उस समय प्रोफेसर्स के लिए ,कुर्सी होती थी लकड़ी वाली ,

चौड़ी सी कुर्सी ,सफेद तारों से बुनी वाली | 

 

सुबह जल्दी पहुँच कर ,हम दोनों ने चाक पीसकर ,

उसका पाउडर डाला ,बुने हुए तारों पर | 

 

मन ही मन हम प्रसन्न थे ,इंतजार कर रहे थे ,

कॉलेज शुरू हुआ तो प्रोफ़ेसर उसपर बैठ रहे थे | 

 

प्रोफेसर के बैठने पर ,हम भी बैठ गए थे ,

और अब प्रोफेसर के उठने का इंतजार कर रहे थे | 

 

थोड़ी देर बाद प्रोफेसर उठे ,बोर्ड के तरफ मुड़े ,

क्लास के सभी विदयार्थी ,जोर से हँस पड़े | 

 

अब प्रोफ़ेसर हमारी तरफ मुड़े ,बोले - क्या हुआ ? 

मगर कौन बोलता कि ,क्या हुआ ? क्या हुआ ?

 

प्रोफ़ेसर की काली पैंट पर ,सफेद जाल बन गया था ,

कुर्सी का डिजाइन उनकी ,पैंट पर बन गया था | 

 

सारी क्लास खुश थी मन ही मन ,प्रोफेसर को कुछ पता नहीं चला ,

स्टाफ रूम में जाकर ही ,उन पर ये राज खुला | 

 

ऐसी थीं शरारतें सखि हमारी ,

पसंद आईं या नहीं ,बताना भाई | 

 

Sunday, May 2, 2021

DAAYARI MERI SAKHI ( 03/05/2021 )

 

 

 डायरी मेरी सखी  ( 03 /05 2021 ) 

 

सुनो सखि तुमको आज मैं ,एक पुरानी बात बताऊँ ,

कॉलेज में पढ़ते दिनों की ,एक मजे की बात बताऊँ | 

 

मेरठ शहर में लगता था दोस्तों ,नौचंदी का मेला ,

हमने बचपन से ही दोस्तों ,देखा था वो मेला | 

 

गर्मी शुरू हो रही थी ,शुरू हुआ जब मेला ,

हम तो दोस्तों जा पहुँचे ,देखने को वो मेला | 

 

वहाँ पहुँच कर झूलों में बैठे ,घूमें पूरा मेला ,

घूम -घूम कर पूरा मेला ,सबका पेट भी बोला | 

 

 खाने की जब बात सुझाई ,सब ने अपना मुँह खोला ,

हम को कुल्फी पसंद थी दोस्तों ,हमने भी मुँह खोला | 

 

सब तैयार हुए कुल्फी को ,ऑर्डर दिया गया कुल्फी का ,

कुल्फी खाने को दोस्तों ,आया कुल्फी का रेला | 

 

सबने खाना शुरू किया ,स्वाद ले लेकर ,

एक के बाद एक कुल्फी ,आई और खाई लेकर | 

 

सबने ही कुल्फियों का रेला ,अपने उदर उतारा ,

ज्यादा कुल्फी खाने के कारण ,दाँतों ने काँप पुकारा | 

 

अब बीएस करो कहानी कुल्फी ,और ना खा पाऊँगा ,

कुल्फी ने भी उदर में जाकर ,शरीर को कँपकँपाया | 

 

सभी ने बीएस किया क्योंकि दोस्तों ,

सभी को लगी थी सर्दी ,सभी काँप रहे थे , 

सर्दी से भई सर्दी से | 

फिर मिलेंगे सखि ,जय हिन्द | 


Saturday, May 1, 2021

SHRIDDHA SUMAN ( BHAG - 3 )

 

श्रद्धा  सुमन ( भाग - 3  ) 


मैं ही मधुशाला के अंदर ,

जहाँ बरस रही हाला ,

           चातक पक्षी बन बैठा हूँ ,

            जिव्हा बनी मेरा प्याला ,

बूँद -बूँद टपकाती जाती ,

छिपी कहाँ साकी बाला ,

             बैठ कहाँ मुस्काती होगी ,

              मेरी अपनी मधुशाला | 

 

सागर ने तो दिया हलाहल ,

मधुशाला ने दी हाला ,

                सागर की मस्त लहरें ही ,

                बनीं चंचल साकी बाला ,

लहरों ने चुल्लू भर दीना ,

मधुशाला ने भरा प्याला ,

                  उस प्याले ने मेरे अंदर ,

                  भर दी जीवन की हाला | 

 

विश्व छोड़कर चला गया जब ,

छोड़ गया अपना प्याला ,

                  जो कोई चाहेगा पीना ,

                   पीले मदिर ,मधुर हाला ,

पिला ही देंगी सभी को हरदम ,

वो सुंदर साकी बाला ,

                     बुला ही लेगी सभी को अंदर ,

                      उस प्रिय कवि की मधुशाला | 

 

DAAYARI MERI SAKHI ( 02/05/2021 )

 

 डायरी मेरी सखि  ( 02 /05 /2021 )

 

    नमन सभी उन हाथों को ,

   इस लॉक डाउन में जो मदद करें ,

    नमन सभी उन मददगारों को ,

   इस लॉक डाउन में जो मदद करें | 

 

बिना मदद हम क्या करते ? 

कैसे सामान मुहैया करते ?

घर बैठे दिलाया सब कुछ जिन्होनें ,

इस लॉक डाउन में मदद करें | 

 

दवाएँ मेडिकल स्टोर में भरी पड़ीं पर ,

वहाँ से हम उन्हें लाएँ कैसे ? 

घर बैठे दवाएँ पहुँचाएँ जो ,

इस लॉक डाउन में मदद करें |

 

कोरोना वैक्सीन बनीं हैं बंधु ,

लगानी तो जरूरी है ,

अस्पतालों में सभी कुछ मैनेज करके ,

इस लॉक डाउन में मदद करें | 

 

किस - किस का गिनाएँ बंधु ? 

किसने अपना साथ दिया ? 

नमन उन सभी जनों को ,

जो लॉक डाउन में मदद करें | 

 

DAAYARI MERI SAKHI ( 01/05/2021 )

 

          डायरी मेरी सखि  ( 01 /05 /2021  ) 

 

 करोड़ों  हाथ हैं उठते ,मदद करने को दूजों को ,

 खिलाते हैं वो फूलों को ,खुश्बुएँ देते दूजों को | 

 

 वो तो रहने को घर बनाते हैं ,

चलने को बनाते हैं वो गाड़ियाँ ,

पहनने को वो बुनते हैं ,नई सुंदर साड़ियाँ | 


सफाई उनके दम से है ,सप्लाई उनके दम पर है ,

सभी सामान जो मिलता,सभी कुछ उनके दम पर है | 


उनकी दुनिया में तो बंधु ,ना ऊँची बिल्डिंगें बंधु ,

ना खुश्बुएँ उन्हें मिलतीं ,ना सुंदर सी साड़ियाँ | 


जिंदगी बीतती उनकी ,अभावों में ही डूबकर ,

चलो हम साथ उनका दें ,अपने हाथों को आगे बढाकर | 


सम्मान सहित उनका, जीवन हम सँवारें ,

बच्चों का उनके बंधु ,भविष्य हम निखारें ,

कोई कमी ना छोड़ें, हम उनकी जिंदगी में ,

फूलों की खुश्बुएँ हम ,भर दें उनकी जिंदगी में |