Saturday, November 28, 2020

THAMO HAATH MERA ( PREM )

       थामो हाथ मेरा 

 

माँ थाम लो तुम  हाथ मेरा ,

चलना मुझे सिखा दो ,

टेढ़े - मेढ़े रास्ते दुनिया के हैं माँ ,

संभलना मुझे सिखा दो | 

 

गुरु जी थाम लो तुम हाथ मेरा ,

पढ़ना - लिखना मुझे सिखा दो ,

बड़ी सी इस दुनिया में ,

आगे बढ़ना मुझे सिखा दो | 

 

बापू थाम लो तुम हाथ मेरा ,

कर्मक्षेत्र मुझे दिखा दो ,

इतनी सारी राहें हैं दुनिया की ,

कर्मठ बनना मुझे सिखा दो | 

 

दोस्तों थामो तुम हाथ मेरा ,

प्यार की दुनिया में ले जाओ ,

मौज - मस्ती भरी इस दुनिया में ,

मस्त रहना मुझे सिखा दो | 

 

हे ईश्वर थाम लो तुम हाथ मेरा ,

तुम्हारी रची इस दुनिया में ,

अज़ब - गज़ब जिंदगी में , 

इंसान बनना मुझे सिखा दो | 

 

 

Thursday, November 26, 2020

AAKAR HAI KANKAL ( JIVAN )

    आकार है कंकाल 


कंकाल है आधार ,इस शरीर का ,

कंकाल है तो आकार ,इस शरीर का ,

कंकाल के कारण ही तो ,हम खड़े हैं ,

कंकाल के कारण ही तो ,हम बड़े हैं |


कंकाल को समझे कोई ,क्यों डरावना ?

कंकाल है गर ठीक तो ,मौसम सुहावना ,

कंकाल ना हो गर हमारे अंदर, तो हम क्या हैं ?

माँस का एक लोथड़ा है, आकार के बिना |


दिल - दिमाग सब तो, कंकाल में सुरक्षित ,

उसी ने तो किया है, सभी को रक्षित ,

कंकाल ही तो दोस्तों है,नींव जिंदगी की ,

सुंदरता है हमारी साँस की ,है आस भी रक्षित |


मजबूती से बना हो ,तो दौड़ हम लगाते ,

वरना तो दोस्तों हम ,चल भी नहीं पाते ,

इसका ख्याल रखना ,रखना इसे सुरक्षित ,

हमारा है कर्त्तव्य कि ,रखें इसको हम सुरक्षित |



Sunday, November 22, 2020

CHANDA -- 1 ( PAIDAL -PAIDAL )

 चंदा -- 1 (  पैदल - पैदल )  भाग - 28 

 

चाँद घूमे पूरी रात ,पैदल - पैदल ,

थक जाता है क्योंकि चले रात भर ,पैदल - पैदल ,

तपस्या वो करता रात भर ,पैदल - पैदल | 

 

माँ से कहा तो बाजार गए ,पैदल - पैदल ,

खाली था बाजार भी ,नहीं मिली नई साईकिल ,

चलने लगे दोनों वापस ,पैदल - पैदल | 

 

ऊँची दुकान फीके पकवान के बीच से ,

किसी ने पुकारा जोर से ,पलटे दोनों ,

देखा दुकानदार आ रहा था ,पैदल - पैदल | 

 

एक पुरानी साईकिल है ,क्या लोगे तुम ? 

चाँद बोल पड़ा एकदम ,हाँ -हाँ ,हाँ - हाँ ,

क्या दाम देना पड़ेगा जरा बताओ ? 

कुछ नहीं ,कुछ नहीं ,तुम वापस तो आओ | 

 

नहीं चाहिए मुझको पैसे ,तुम साईकिल ले जाओ ,

मिली साईकिल ,थी पुरानी ,मगर अच्छी ,

लेकर चले दोनों ,माँ को था पीछे बिठलाया ,

नहीं अब चलना पड़ा दोनों को ,पैदल - पैदल | 

 

रात हुई चाँद ने उठाई साईकिल ,

चला चाँद दुनिया की सैर को ,

मुस्कुराता चाँद अब ना चला ,पैदल -पैदल | 

 

एक छोटी सी ,भोली सी लड़की ,

देख चाँद को मुस्कायी ,माँ से बोली ,

देखो माँ चाँद है साईकिल पे सवार ,

नहीं आज चलता है वो पैदल - पैदल | 

 

चाँद भी मुस्काता बोला ,अब ना चलूँगा पैदल -पैदल ,

अब तो दौड़ लगाऊँगा मैं ,मार के पैडल -पैडल |

Tuesday, November 17, 2020

ULJHE DHAGE MOH KE ( PREM )

       उलझे धागे मोह के 


मोह के हैं जो रंग - बिरंगे धागे ,

उलझ -उलझ कर घूमते जाएँ ,

कैसे हम उनको अलग -अलग सुलझाएँ ? 


तारे भी कुछ उनमें फँस कर ,

जगमग उन्हें भी कर जाएँ ,

कैसे हम उनको अलग - अलग कर पाएँ ? 


सूखे गुलाब मिल गए किताबों में ,

सभी पंखुड़ियाँ बिखर गईं सी ,

कैसे हम उनको एक साथ जोड़ पाएँ ? 


जल परियाँ तो सिर्फ कहानियों में ,

मगर सभी करती हैं मोहित दिलों को ,

कैसे हम उनको हकीकत में देख पाएँ ? 


दीप जले तो गुम हुआ अँधियारा ,

सारे जग में छा गया उजियारा ,

आओ मिलकर हम सब ही मन के दीप जलाएँ ,

प्यार बाँट कर दुनिया में प्यार के दीप जलाएँ ,

मोह के रंगीन धागों में और भी उलझ जाएँ | 



Monday, November 16, 2020

MOHAN PYARE ( GEET )

     मोहन प्यारे 


भागो मोहन प्यारे ,भागो ,

भागो इस कोरोना से दूर को ,भागो ,

भागो  2020  है साथ तुम्हारे ,भागो मोहन प्यारे -- |


कोरोना की लड़ियाँ लटकीं मोहन ,

तोड़ के उनको दूर करो ना ,

जो मानव परेशान हैं उनसे ,

उनकी तुम परेशानी हरो ना ,

तुम भी दूर हो जाओ मोहन ,भागो मोहन प्यारे -- |


सभी मानव तुमको पुकारें ,

उनकी तुम पुकार सुनो ना ,

दुनिया से इस कोरोना को ,

जल्दी से तुम दूर करो ना ,

सबकी तुम परेशानी हरो ना ,

तुम भी दूर हो जाओ मोहन ,भागो मोहन प्यारे -- |


नोट --  इसको पढ़ने वाले अगर जागृति

         फिल्म के गीत "  जागो मोहन प्यारे " की

        धुन पर गुनगुनाएंगे तो अच्छा लगेगा |

Saturday, November 14, 2020

PARIYON JAISI BETIYAN ( GEET )

      परियों जैसी बेटियाँ 


परियों की कहानियाँ ,कहानियों की परियाँ ,

परियों के सपने या ,सपनों की परियाँ ,

उड़ती हुई ,सुंदर सी ,नन्हीं - नन्हीं परियाँ |


सोचकर ही दिल में ,प्यार उमड़ आता है ,

आँखों में सुंदर सी,गुड़िया सी,मूरत उभर आती है|


घर की नन्हीं बेटियाँ ,परियाँ ही तो होतीं हैं ,

सुंदर सी ,चुलबुली सी ,नन्हीं -नन्हीं गुड़ियाँ होतीं हैं |


उन्हीं परियों से ही तो ,घर भी परीलोक बन जाता है ,

सपनों में जैसे हम रहते हैं,सपना भी सुंदर बन जाता है|




Friday, November 13, 2020

AAJ DIWALI RE ( GEET )

    आज दिवाली रे 


दीप जलाओ ,दीप जलाओ ,आज दिवाली रे ,

दीपों की सुंदर हैं लड़ियाँ ,आज दिवाली रे |


मंदिर में सजती है आरती ,आज दिवाली रे ,

मन मयूर भी नृत्य कर उठा ,आज दिवाली रे |


छुटे पटाखे ,बँटी मिठाई ,आज दिवाली रे ,

पूरे देश में बजी बधाई ,आज दिवाली रे |


पकवानों की खुश्बु उड़ती ,आज दिवाली रे ,

बच्चे उड़ते पंछी जैसे ,आज दिवाली रे |


तुम भी खुश हो हम भी खुश हैं ,आज दिवाली रे ,

मुस्कानों की लड़ियाँ सजतीं ,आज दिवाली रे |



Thursday, November 12, 2020

BAYAR OR TOOFAN (POETRY FESTIVAL )

    बयार और तूफ़ान 


मीठी -मीठी चली बयार,साँसें आतीं रहीं हजार ,

पेड़ों का ये जादू है, जो चलती रही सरस बयार |


मुस्कान से खिले चेहरे,कहते सब मौसम खुशगवार,

देख-देखकर,सुन -सुनकर,खुद भी तो मुस्काई बयार |


गुड़िया भी खुश होकर खेले ,भैया भी तो झूला झूले ,

पौधों की पत्तियाँ जब हिलतीं ,फूलों की मुस्कानें झूलें | 


जब बयार बन जाए पवन ,मम्मी का उड़ जाए दुपट्टा ,

गुड़िया ,भैया भागे जाएँ ,तितलियों को पकड़ ना पाएँ |


होती जाए तेज पवन ,बादल आए उड़ -उड़कर ,

सूरज छिपा बादलों में ,बूँदें झरने लगी झर -झर |


पवन ने अब तेजी पकड़ी ,बदरा भी घनघोर हुए ,

तेजी से वर्षा है आई ,अंधकार फैला है भाई |


सभी छिप गए घर में अपने ,जीव -जंतु, बच्चे जितने ,

कोई नहीं है बाहर अब ,झाँक रहे हैं बाहर सब |


खिड़की भी ना खुले अभी ,वर्षा हो चली मूसलाधार ,

हवा तेज आँधी के जैसी ,कहाँ से आई हवा ये ऐसी ?


पेड़ भी अब तो डोले हैं ,लगता जैसे नहीं हैं बस में ,

हवा ने उनको पस्त किया ,मानो उन्हें परास्त किया |


हवा का ये कैसा है रूप?छिप गई जिसके कारण धूप,

बदरा आए ,वर्षा आई ,हवा ने बदला मौसम का स्वरूप |


हवा के तो हैं अनेकों रंग ,चलते जाते जो संग -संग ,

शांत हो तो है नाम बयार ,ऐसे चलती जैसे तरंग |


हो तेज तो आँधी ,तूफ़ान ,टूटें पेड़ ,उड़ें सामान ,

पर यही हवा जरूरी है ,साँसों का है ये सामान |

Wednesday, November 11, 2020

JALDHAR ( JIVAN )

                  जलधार


पहाड़ों का सीना चीरकर ,जलधारा झरी झर -झर ,

नाम मिला इस जलधार को, झरना कहा जलधार को,

जलधार थी बर्फीली ,बर्फ का पिघला स्वरूप ,

स्वच्छ जल की धार थी ,उसका स्वरूप था अनूप |


वो ना रुकी चट्टान से ,वो ना रुकी पहाड़ से ,

बहती गई लगातार ,रास्ता अपना बनाती गई ,

शीशे जैसी पारदर्शी ,शीशे जैसी स्वच्छ ,

चेहरा उस में देखकर ,कर सकते हैं मेकअप |


जलधार जब झरना बनी ,नीचे को वो गिरती गई ,

नीचे बही नदिया के जैसी ,आगे को बढ़ती गई ,

जिधर भी मिला रास्ता ,उधर ही वो बढ़ गई ,

उसके दोनों किनारों पर ,हरियाली छा गई |


मैंने तो जब उसको देखा ,दिल मेरा डोल गया ,

कदम बढ़े उस ओर को,जल में मेरा कदम गया,

ठंडी सी सिहरन से मैं,अंदर तक तब काँप गई,

मगर लंबी साँसें लेकर ,जल में मैं तो उतर गई |


खड़ी हो जल के अंदर ,दिल भी  मानो भीगा था ,

तनमन जल के अंदर थे,ख़ुशी का मानो सागर था,

ऐसी खुशी ना पाई थी ,पहले कभी ,पहले कभी ,

आज मिली है मुझको जो ,पहली - पहली बार |


आसपास की  हरियाली ,नई -नई सी ,सुन्दर सी,

दिया रूप उसने जलधार को ,सुंदर और प्यारा सा ,

जलधार थी पूरक हरियाली की ,

हरियाली थी शुक्रगुज़ार जलधार की,उस झरने की |


यही है दोस्तों प्रकृति ,स्वरूप है उसका अनोखा ,

प्रकृति खिल जाती है अगर ,उसे मिले एक मौका |




Tuesday, November 10, 2020

KHOLO DWAR ( JIVAN )

                     खोलो द्वार

 

ऊपर बैठे कुम्हार ने ,माटी के पुतले बनाए ,

नीचे भेजा उनको ,उनमें प्राण जगाए ,

दुनिया में आकर वो खेले ,कूदे ,नाचे ,गाए ,

खुशियाँ फैलीं दुनिया में ,पुतले मानव कहलाए | 


उसी कुम्हार ने कुछ ,भिन्न आकार बनाए ,

उनमें से कुछ आकार तो ,मानव को लाभ कराए ,

लेकिन कुछ आकार तो ,मानव को सताएँ ,

ऊपर बैठे कुम्हार ने उनके ,इलाज नहीं बताए | 


छोटे -छोटे नुकसान तो,मानव भी सहता जाए ,

मगर कुछ नुकसान तो ,मानव को तड़पाएँ ,

उन्हीं में एक कोरोना है ,जो मानव को रुलाए ,

बिना मास्क के मानव ,घर से निकल ना पाए | 

 

मास्क पहन मानव तो ,शुद्ध हवा ना ले पाए ,

अपनी छोड़ी साँस ही मानव ,फिर अंदर ले जाए ,

कोरोना से बच जाने पर भी,मानव दूसरे रोग लगाए,

 अस्थमा जैसी बीमारी का ,वो शिकार बन जाए | 


अपना द्वार खोलो हे ईश्वर ,कोरोना वहाँ आ जाए ,

आज जो उसका रूप बना है ,सब को वह रुलाए ,

लाखों मानव उसके कारण ,काल के गाल में समाए ,

उसका रूप बदल दो ईश्वर ,सभी को लाभ पहुँचाए | 



Monday, November 9, 2020

PREM KAHANI ( PREM )

   प्रेम कहानी 


सखि एक प्यारी ,सब की थी दुलारी ,

स्कूल जब छूटा ,कॉलेज से नाता जुड़ा था ,

मस्ती भरे थे दिन,मन मयूर नाचे तिनक दिन,

वो उम्र ऐसी थी,सब कुछ सुंदर लगता था|


एक दिन वह बोली ,एक लड़का मेरे पीछे ,

रोज घर से कॉलेज और कॉलेज से घर आता है,

बोलता कुछ नहीं बस देखता जाता है |


हम भी हँस दिए दोस्तों ,कहा उससे ,

मत डर सखि ये तो तेरा बॉडीगार्ड है ,

किसी तरह की समस्या नहीं आएगी ,

आएगी तो डर कर भाग जाएगी |


ऐसे ही दिन बीतते रहे ,साथ चलता रहा ,

सभी कुछ यूँ ही पलता रहा ,

मुस्कानों,खिलखिलाहटों का दौर चलता रहा |


एक दिन वह सखि मेरे घर आई ,

नई बात उसने सुनाई,उस लड़के ने कहा है,

उसे प्रेम है सखि से ,वह जान दे देगा ,

यदि वह सखि हाँ नहीं कहेगी तो |


मैंने कहा जान कोई नहीं देता डर मत ,

वह बोली यदि सच हुआ तो ,

मैंने कहा -तो तू हाँ कर दे ,

लड़का तुझसे सुंदर है ,पढ़ा -लिखा है ,

जाति भी तुम्हारी है ,प्रेम भी करता है ,

व्यापार भी करता है ,क्या परेशानी है ,

सखि उलझन में थी,माता-पिता का डर था|


खैर दोस्तों ,कुछ दिन बाद ,

सखि की कजिन की शादी थी ,

सखि के जीजाजी से उसने दोस्ती बढ़ाई ,

उन्हें सारी बात समझाई ,जीजाजी ने ,

घरवालों को बताया ,सारा माजरा समझाया |


माता -पिता खुश हुए ,और कुछ महीनों बाद ,

सखि दुल्हन बनी डोली थी सजी ,

सपनों जैसा संसार सजा ,जिंदगी आगे बढ़ी ,

एक प्रेम -कहानी शादी में तब्दील हुई ,

जिंदगी भी मानो चलने की जगह उड़ती गई |




 

Saturday, November 7, 2020

MILA BACHPAN ( RATNAKAR )

    मिला बचपन  ( रत्नाकर )


एक लड़की नादान सी ,शैतान सी ,

पहुँच गई उड़ते हुए बादलों के पार ,

ढूँढते हुए अपने नादान बचपन को ,

चाँद के देश में बादलों के पार |


बचपन तो पता नहीं कहाँ खो गया ?

सारी नादानियाँ अपने साथ ले गया ,

शैतानियों के साथ खिलखिलाहटें भी ले गया ,

बादलों के पार सूरजमुखी का बगीचा मिल गया |


बादलों से उतर कर चली नीचे को ,

सूरज की रश्मियों ने उजालों से भर दिया ,

समंदर की लहरों ने उछालों से भर दिया ,

सूरज और समंदर को मुस्कुराहटों से भर दिया |


समंदर के साथ रेत भी था दोस्तों ,

उसमें भी अनगिनत लहरें छिपीं थीं ,

मगर ये लहरें उछालों से ना भरीं थीं ,

सूखे - सूखे ,ऊँचे -ऊँचे टीलों से भरीं थीं |


पवन ने तेज होकर रेत को उड़ाया ,

रेत ने उड़ -उड़ कर बवंडर बनाया ,

तभी बादलों की समझ में बात आई ,

छाकर गगन में सूरज को छिपाया |


वर्षा को नीचे भेजा बवंडर को दबाया ,

तभी बचपन आया रेत का घरोंदा बनाया ,

घरोंदे को बनाकर लड़की ने उसको देखा ,

मुस्कुराहटों से उसने घरोंदे को सजाया | 




Wednesday, November 4, 2020

DARPAN ME BACHPAN KAHAN ( GEET )

   दर्पण में बचपन कहाँ ?


दर्पण तो है आज बताता ,कैसे बताए कल की बात ?

आज दिखेगा दर्पण में ,छोड़ो कल की कल पर बात |


बचपन की गलियाँ छूट गईं,जिंदगी चल दी आगे-आगे,

वो गलियाँ अब देखें कैसे?बँधे जहाँ बचपन के धागे |


कुछ सखियाँ हैं साथ अभी ,कुछ को ढूँढे नयन मेरे ,

इतनी बड़ी दुनिया है बँधु ,उम्मीद बड़ी है मन में मेरे |


रुकता नहीं किसी का बचपन,उम्र तो आगे बढ़ती जाती,

तभी तो बँधु सफर में आगे ,बचपन की यादें हैं आतीं |


जीते हैं अब अपना बचपन ,बच्चों के संग खेल नए ,

उन्हीं की हँसी में हँसते हम ,उन्हीं में पाते बोल नए |


पकड़ नहीं पाते हैं हम ,बचपन को इन हाथों में ,

बस बचपन के खेल ही तो ,बच्चों को सिखाते जाते हैं |

Tuesday, November 3, 2020

JIVAN ME ( GEET )

     जीवन में 


सुनहरी सुबह की लाली ,

बसी रहे जीवन में ,

खिलतीं रहें प्यार की कलियाँ ,

महकी रहें जीवन में |


बरसों - बरस साथ रहे ,

तुम्हारा और जीवन साथी का ,

उजाला भरपूर रहे दोनों के जीवन में |


शुभकामनाएँ सदा हमारी ,

तुम्हारे साथ बनी रहें ,

प्यार फैलता रहे दोनों के जीवन में |


ये करवा चौथ मुबारक हो ,

ऐसे ही ये आती रहे ,

सदा खुशियाँ बरसाती रहे ,

समेट लो सारी खुशियाँ अपने जीवन में |




Sunday, November 1, 2020

CHANDA ----- 1 ( PATR CHANDA KA )

 चंदा   ----  1   (  पत्र चंदा  का  )   

 

कल चंदा ने भेजा है खत ,लिखा है उसने मेरे नाम ,

लिखा है उसमें यारों ,सब घर वालों को परनाम | 

 

बहुत दिनों से मिले नहीं हम ,मैं भी घर में ,तुम भी ,

बदरा मुझे छिपा लेते हैं ,तुम हो द्वार के अंदर में | 

 

मेरे करोड़ों ,अरबों बच्चे ,नन्हें से तारे शैतान ,

अगर आऊँगा तुमसे मिलने,मचा ही देंगे वो तूफ़ान | 

 

तुम्हें भी तो पाबंदियाँ हैं ,मैं भी घर में कैद सखि ,

कैसे निकालूँ मैं बाहर ,डर की है दीवार खड़ी | 

 

वायरस बहुत ही छोटा है ,मगर है वो घना ही घातक ,

तारा एक बीमार हुआ तो ,मच जाएगा फिर आतंक | 

 

सृष्टि का क्या हाल ही होगा ? कौन इलाज करेगा फिर ? 

एक अकेला रखवाला हूँ ,कौन साथ देगा मेरा फिर ? 

 

सूरज तो है ताप भरा ,मैं ठंडा हूँ शीतल सा ,

सूरज के साथी भी तगड़े ,मैं तो बड़ा ,कभी छोटा सा | 

 

ठीक  चंदा घर में रहना ,सारे नियम निभाओ तुम ,

जब सब ठीक हो जाएगा ,तब मेरे घर आओ तुम | 

 

पत्र सदा लिखते रहना ,हाल चाल बतलाओ तुम ,

मेरी चिंता नहीं तुम करना ,प्यार मेरा सब पाओ तुम | 



TERI SOORAJMUKHI ( GEET )

     तेरी  सूरजमुखी


सूरज का उदय नील गगन में ,

जब होता है तो किरणें उसकी ,

फ़ैल गगन में लेतीं हैं चुस्की ,

खिलने लगती है सूरजमुखी |


रंग बदलता है गगना का ,

ख़ुशी वो जाहिर करता है ,

तभी धरा पर खिलते - खिलते ,

मुस्काती है सुंदर सूरजमुखी |


सूरज के संग -संग उसी दिशा में ,

घूमती रहती सूरजमुखी ,

पूरा दिन सूरज को देख - देख ,

खिल जाती पूरी सूरजमुखी |


सूरज के प्यार में डूब के ,

देख उसे संभलती हुई ,

अदृश्य डोर से बँधी हुई ,

घूमती रहती सूरजमुखी |


मानो गुनगुना रही हो ,

"तू सूरज मैं सूरजमुखी हूँ पिया ,

ना देखूँ तुझे तो खिले ना जिया |"




"तू सूरज मैं सूरजमुखी हूँ पिया ,

ना देखूँ तुझे तो खिले ना जिया |"