Monday, July 6, 2015

JHARANAA

            झरना

  झर - झर , झर - झर झरना बहता ,
    आओ पास मेरे वह कहता ,
       ऊँचे नभ से मानो झर कर ,
          उतर धरा पर कल - कल बहता ॥
 
अनगिनत पत्थरों से टकराता ,
  धरा पे हरियाली बिखराता ,
     जल मानो हो कर बेकल ,
         कल - कल - कल का शोर मचाता ॥
 
जिसने  भी सुनली यही पुकार ,
  वही आ गया उस के पास ,
     छूकर उसका निर्मल जल ,
         नहीं दूर को जाने पाता ॥
 
ठंडा , निर्मल , स्वच्छ सा नीर ,
   झरने का आड़ा - टेढ़ा तीर ,
       रुकते नहीं हैं मानो पग ,
           कदम - कदम बढ़ता जाता ॥
 
ठंडे नीर ने किया है स्वागत ,
  चलते जाते कदमों का ,
      पाँव वहाँ जमते हैं जाते ,
          बर्फ पिघल पानी आता  ॥
 
देख जमे से पाँव हमारे ,
    झरना यूँ मुस्काता है ,
       देखो मैं कितना बर्फीला ?
          पर मैं ना ही जम जाता ॥
 
निर्मल , स्वच्छ जल देता हूँ ,
   झर - झर - झर  झरता जाता हूँ ,
      अँजुरी भर तुम पीलो मुझको ,
           सबकी प्यास बुझाता हूँ ॥
 
धरा हरी हो जाती मुझसे ,
   पानी लेती प्यास बुझाती ,
      तभी तो इस सारी धरती पर ,
          सदा ही हरियाली लहराती ॥    

   

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