Tuesday, February 4, 2025

DHARAA PE ( RATNAAKAR )

 

                          धरा पे 


सारे जहां में फैला सागर ,जल का अतुल भंडार ,

फिर भी मीठा जल ना मिलता ,पीने को भई जीने को ,

वैसे जीवन उपजा सागर में ,वहीं से आया धरा पे  || 

 

 आज है दुनिया बदली ,धरा पे जीवन फैला ,

सागर में भी जीवन फैला ,दोनों ही अलग - अलग ,

मगर जीवन तो जीवन है ,चाहे हो सागर में ,चाहे धरा पे || 


बदलाव हमेशा आता है ,धरा पे मानव आया ,

उसने जलवायु को बदला ,खूब प्रदूषण फैलाया ,

अब तो बंधु ,मुश्किल हो गया ,जीवित रहना धरा पे || 


मानव  ने अपने लिए ,सुविधाएँ जुटाईं ,

मगर प्रकृति को बिगड़ाया ,प्रकृति ने भी मानव को ,

भरमाया   और बदला लेने के लिए ,

जाल बिछाकर मानव को पकड़ा धरा पे || 


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